क्या जाति को खत्म किया जा सकता है?

वर्ण को खत्म किया जा सकता है क्योंकि ये कृत्रिम है। वैसे भी ये ब्राह्मण धर्म के एक सिद्धांत रूप में ही ज्यादा रहा प्रैक्टिकल पूरी तरह कभी लागू नही हो पाया। लेकिन जाति को कोई कैसे खत्म कर सकता है? जाति का बनना बिगड़ना अधिकतर प्राकृतिक प्रक्रिया है, इसे कोई बना नही सकता तो इसे कोई खत्म कैसे कर सकता है? और कोई जाति को खत्म क्यों करना चाहेगा? दुनिया के सभी प्राणियों में विविधता एक वांछित लक्षण है। अपने हितों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए संप्रदाय गुट या जाति रूप में संगठित होना प्राणियों में नैसर्गिक प्रक्रिया है। पूरी दुनिया में जाति या संप्रदाय के संगठन के दम पर ही लोगो ने अपनी सुरक्षा के साथ प्रगति भी की है। विश्व ने जो भी प्रगति की है उसमे जातीय संगठन का बड़ा हाथ रहा है।  

भारत दुनिया का सबसे ज्यादा कृषि योग्य भूमि वाला देश रहा है, सबसे ज्यादा भौगोलिक, नस्लीय, भाषाई भिन्नताओ वाला देश भी रहा है इसलिए यहां एक विशेष प्रकार की जातीय व्यवस्था पैदा हुई। लेकिन इसी जाति व्यवस्था के कारण सुरक्षा शांति सहिष्णुता और उन्नति सुनिश्चित हुई। भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था। जहां पश्चिमी सभ्यता का पूरा इतिहास ही जातिगत अत्याचारों और उनके विरुद्ध क्रांतियो का इतिहास है, वहां जाति के आधार पर देश तक बने हैं, जबरिया विस्थापन तक झेलना पड़ा है। वहीं भारत में आधुनिक काल से पहले कभी इस तरह की जातिगत हिंसा नही सुनी गई। जातिगत संगठन के कारण और विभिन्न जातियों की एक दूसरे के ऊपर निर्भरता के कारण ताकतवर के अनाचार पर लगाम रहती थी। उदाहरण के लिए बढ़ई, लोहार, नाई जैसी बेहद अल्पसंख्यक जातियों की सैकड़ों गांवों की पंचायतें होती थी। एक गांव में अत्याचार हुआ तो पूरे इलाके या रियासत में हड़ताल हो जाती। तुष्ट करने के लिए ठाकुर मेहतर जैसे उपनाम भी दिए जाते। 

जाति किस तरह सर्व समाज या किसी क्षेत्र के विकास में योगदान देती है ये गुजरात की पाटीदार जाति के वर्तमान ग्रामीण गुजरात की समृद्धि में योगदान से जान सकते हैं। जातिगत संगठन के बल पर आर्थिक विकास होता है तो उस जाति का सामाजिक एवं राजनीतिक विकास भी अपने आप होता है ये भी इसी जाति के इतिहास से जान सकते हैं। उस क्षेत्र में तो जातीय संगठन के आधार पर आर्थिक सामाजिक विकास के कई उदाहरण अभी भी होते हुए देखे जा सकते हैं। इसी तरह हरियाणा में अगर जाट ना आए होते और 1947 के बाद खत्री/अरोड़ा ना आए होते तो आज हरियाणा और कान्यकुब्ज क्षेत्र की हालत में थोड़ा ही अंतर होता।

पारसी जो एक जाति के रूप में दक्षिणी गुजरात में बसे हुए थे उनके विकास और समृद्धि के पीछे भी जातीय संगठन और सोच का ही योगदान है। उन्हे कोई 3-4 सदी पहले कहता कि जाति संप्रदायवाद छोड़ो सिर्फ हिंदुस्तानी बनो तो आज वो सूरत क्षेत्र में छोटे मोटे किसान या दुकानदार होते। मारवाड़ी बनिए ना होते और उनमें जातिगत सोच ना होती तो आज महाराष्ट्र से लेकर देश के कई राज्य आर्थिक रूप से आज के मुकाबले पिछड़े होते। महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में जहां कुछ सदी पहले तक व्यापारिक गतिविधियों का अभाव होता था, जिस कारण वहां व्यापारिक जातियों का अभाव था, वहां की व्यापारिक और आर्थिक उन्नति में मारवाड़ी बनियों की व्यापारिक वृत्ति और जातिगत सहयोग का एकतरफा योगदान है। मुंबई को आज मुंबई बनाने में मारवाड़ी, गुजराती बनियों और पारसियो की व्यापारिक वृत्ति और जातिगत संगठन का बड़ा हाथ है। और सबसे बड़ी बात, अगर जाति ना होती तो भारत को जीतना, राज करना और धर्मांतरण करवाना फारस या तुर्किस्तान जितना आसान होता। 

अगर जाति को हितकारी ना भी माने तब भी जाति खत्म करने की बात करना हास्यास्पद है। ये एक प्राकृतिक और स्वाभाविक  विभाजन है समाज का। एक बड़े समाज में इस तरह का विभाजन होता ही है। धार्मिक विचारधारा के कारण कुछ फर्क जरूर आते हैं लेकिन भारत में जितने भी धर्म हुए हैं सब में जातियां रही हैं। चाहे वो बौद्ध धर्म हो या जैन या इस्लाम या सिक्ख, पारसी या यहूदी सब में जातियां रही हैं। पुर्तगाली गोवा के ईसाइयों में भी जातियां रही हैं। यहां तक कि झारखंड जैसे राज्यों में जनजाति दर्जा प्राप्त समाज में जिनके बारे में यह प्रचार किया जाता है कि ये हिंदू नही हैं और ब्राह्मणवादी व्यवस्था का अंग कभी नही रहे बल्कि कट्टर विरोधी रहे और जिनका अब सरना नाम से धर्म बताया जा रहा है जो कि बिलकुल सही बात है, उनमें भी नस्ल, पेशे, उत्पत्ति, पलायन आदि के आधार पर अनेकों जातियां हैं, गोत्र व्यवस्था भी है और अंतर्जातीय और सगोत्र विवाह के विरुद्ध इन्हे संवैधानिक संरक्षण भी मिला हुआ है। विभिन्न धार्मिक संप्रदायों ने जाति व्यवस्था पर अपने हिसाब से हस्तक्षेप किया है जिसमे ब्राह्मण संप्रदाय की रुचि सबसे ज्यादा रही और उन्होंने इसपर कई आलेख रचे जिनके ऊपर जाति व्यवस्था बनाने का आरोप है।

बुद्ध से लेकर रविदास तक, किसी भी धार्मिक या सामाजिक उपदेशक ने जाति खत्म करने की बात नही की। क्योंकि ऐसी बात उस समय किसी के मस्तिष्क में आ ही नही सकती थी। जाति खत्म करने की सोचना उसी तरह था जैसे मनुष्यता खत्म करने की बात करना। इन सभी ने जातिगत आधार पर भेदभाव खत्म करने की बात की। 

आज आधुनिक युग में अर्थ, विज्ञान, समाज सभी क्षेत्रों में इतने क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं कि उसके प्रभाव में लोग यह सोचने लगे हैं कि जाति को खत्म किया जा सकता है लेकिन असल में जातियां बदल सकती हैं या जाति व्यवस्था का स्वरूप बदल सकता है लेकिन जाति व्यवस्था पूर्णतया खत्म नहीं हो सकती। मेरे अनुसार तो जाति दो ही शर्त पर खत्म हो सकती है। एक तो दुनिया भर में सब लोग एक साथ सभ्य हो जाएं जैसे कुछ हद तक स्कैंडिनेवियन देशों के लोग हैं और दूसरा सब लोग दिखने में ब्राजील के Pardes यानी वहां की मिक्स रेस जैसे हो जाएं। लेकिन ऐसा तो संभव नहीं लगता। जब तक जाति/कबीला के आधार पर संगठित लोगो की संख्या रहेगी चाहे वो कम ही क्यों ना हो, बचे हुए जाति कबीला विहीन समाज के उसके गुलाम हो जाने की संभावना बनी रहेगी। जैसे भारतीय अकादमिक जगत में वामपंथी कबीले ने अपना वर्चस्व जमाया, ठीक उसी तरह। अगर 100 में से 10 लोग भी किसी कबीले में रहते हैं और बाकी 90 जाति कबीला विहीन समाज में यकीन करते हुए व्यक्तिवाद को प्राथमिकता देते हैं तो उस एक कबीले के 10% लोग बाकी 90 पर हावी हो जाएंगे। 

जातिविहीन व्यक्ति या समाज गुलामी को प्राप्त होता है। जैसे भारत में महानगरों में मौजूद मध्यवर्गीय समाज का एक हिस्सा। इनकी एक विशेषता होती है की इन्हे खुद नही पता होता कि ये मानसिक गुलाम हैं। इन्ही की वजह से आज भारतीय समाज में जातिगत विद्वेष बढ़ रहा है क्योंकि एक बड़े वर्ग के मैदान छोड़ देने से शक्ति असंतुलन का लाभ उठाकर संगठित जातियां बाकी समाज पर हावी हो बाकियों के हितों को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रही हैं और गैर जिम्मेदाराना व्यवहार कर रही हैं। संतुलन हो तो ये लोग अपने आप सर्व समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी दिखाते नजर आएंगे। 

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